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Monday, May 17, 2021

शर्म करो खुद पर ज़रा खुद को इंसान कहते हो





कभी भगवान तो कभी हैवान कहते हो पत्थर से मरने वालों शर्म करो खुद पर खुद को इंसान

कहते हो,

अपना कोई गुजरे तो इल्जाम हम पर लगाते हो , ठीक से इलाज किया भी है या नहीं यह सवाल

हम पर तुम उठाते हो ,

शर्म करो खुद पर खुद को

इंसान कहते हो।

कोई बीमारी हो बुखार हो या करो ना की पुकार हर मर्ज पे तुम्हें बचाया है, कोई त्यौहार हो या

कर्फ्यू बाजार अक्सर मौत ने हमें आजमाया है।।

चुप रहे तुम्हारे ज़ख्म ए निशान देने पर भी आज, हमारी चुप्पी को बेजुबान कहते हो फर्ज किए हैं

हमने पूरे भी भीगी आंखों को हमने फूल की तरह सुख आए हैं आज उन्हीं आंखों को तुम रेगिस्तान कहते हो ।।

शर्म करो खुद को इंसान कहते हो।

किससे मर्ज़ ए दवा करोगे तुम तुमने तो ताबिब को भी मरीज बना डाला,  दी थी जिस लहजे से

गाली अपनी जुबाँ से आकर तुमने उसी लहज़े से गले का ताबीज़ बना डाला, 

जान बचाने डॉक्टर का अपमान करते हो।

शर्म करो खुद पर ज़रा खुद को इंसान कहते हो!


कलम से

दीक्षा निगम

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