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Friday, July 10, 2020

लोधेश्वर महादेवा मंदिर में प्रदेश भर से लाखों श्रद्धालु यहां आकर पवित्र शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं और रुद्रभिषेक कराते हैं व अपनी मनोकामना पूर्ती का वरदान भोले शंकर महादेव से मांगते हैं।



स्पेशल स्टोरी - शिवम् सविता

बम-भोल, बम-बम-भोल की गूंज के साथ कंधों पर कंवर लिये अनेक समूहों में जाने वाले भक्तों की टोलियां भगवान शिव के लोधेश्वर मंदिर के लिये प्रसिद्ध है, जहां भक्तों की इच्छा अति प्राचीन काल से पूरी हो रही है और आज भी हो रही हैं । आज भी, लाखों लोग विभिन्न झुंडों में हर साल फाल्गुन के महीने अर्थात महाशिवरात्रि के अवसर पर प्रसिद्ध शिवलिंग की पूजा करने और गंगा जल अर्पित करने  इस स्थान पर जाते हैं। यह प्राचीन शिव मंदिर जिला बाराबंकी की राम नगर तहसील के महादेवा गांंव में  घाघरा नदी के तट पर स्थित है। लोधेश्वर महादेव का एक प्राचीन इतिहास है। इस मंदिर का शिवलिंग पृथ्वी पर उपलब्ध 52 अनोखे एवं दुर्लभ शिवलिंगों में से एक है।

ऐसा माना जाता है कि, महाभारत काल से पूर्व, भगवान शिव को एक बार फिर से पृथ्वी पर प्रकट होने की इच्छा हुई। पंडित लोधेराम अवस्थी एक विद्वान ब्राह्मण, सरल, दयालु और अच्छा स्वभाव वाला ग्रामीण था। एक रात भगवान शिव ने सपनों में उसे दर्शन दिये। अगले दिन, लोधेराम, जो पुत्रविहीन थे, अपने खेत में सिंचाई करते हुए, उसने एक गड्ढा देखा जहां से सिंचाई का पानी पृथ्वी में जाकर गायब हो रहा था। उन्होंने उस गड्ढे को पाटने के लिए कड़ी मेहनत की, लेकिन असफल घर लौटा। रात में, उसने फिर से उसी प्रतिमा को अपने सपनों में देखा, और मूर्ति को फुसफुसाते हुए यह कहते हुये सुना ‘उस गड्ढे में जहां पानी जाकर गायब हो रहा है, मेरा स्थान है,  वहां मुझे स्थापित करो, इससे मुझे तुम्हारे नाम से प्रसिद्धि मिलेगी’। ऐसा कहा जाता है कि, अगले दिन जब लोधेराम उस गड्ढे की खुदाई कर रहा था, तो उसका उपकरण किसी कठोर पदार्थ से टकराया और उसने अपने सामने वही मूर्ति देखी और उसमें रक्त स्राव हो रहा था, जहां उनका उपकरण मूर्ति पर पड़ा था, यह निशान आज भी देखा जा सकता है। इस दृष्य से लोधेराम भयभीत हुआ, परन्तु मूर्ति के लिये खुदाई जारी रखी, पर मूर्ति के दूसरे छोर तक पहुंचने में असफल रहा। उसने उसे जस का तस छोड़ दिया, और उसी स्थान पर मंदिर का निर्माण किया, जिसे अर्ध-नाम ‘लोधे’ और भगवान शिव के ‘ईश्वर’ का नाम दिया, और इस प्रकार भक्त के नाम अर्थात लोधेश्वर से प्रसिद्ध हो गया। तद्पश्चात ब्राह्मण को चार बेटों का आशीर्वाद मिला, महादेवा, लोधौरा, गोबरहा और राजनापुर के नाम दिये गये, इन नामों वाले गांव आज भी विद्यमान हैं।

महाभारत में कई प्रकरण हैं जहां इस प्राचीन मंदिर का उल्लेख है। महाभारत के बाद पांडव ने इस स्थान पर महायज्ञ का आयोजन किया था, एक कुंआ आज भी पांडव-कुप के नाम से यहां का अस्तित्व में है। ऐसा कहा जाता है कि इस कुंए के पानी में आध्यात्मिक गुण हैं, और जो कोई इस पानी को पीता है उसकी कई बीमारियों ठीक हो जाती हैं।

दुनिया भर में मेलों और जनमानस के एकत्रित होने वाले समूहों के इतिहास में, महादेवा में महाशिवरात्रि के अवसर पर आयोजित मेला अद्वितीय है। इस त्यौहार के मेले के अवसर पर इस जगह पर आनेवाले लाखों श्रद्धालुओं में एक भी महिला भक्त नहीं होती है।

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