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Friday, May 1, 2020

लखनऊ : देश वासियों से मानवेंद्र आजाद की मार्मिक अपील व हिंदुस्तान की समस्त राजनैतिक दलों से गुजारिश .....

 हर पल सोचा उन मजदूरों के लिये, किया हर संभव प्रयास, नतीजा वही ढाक के तीन पात- आजाद

जैसा कि आप सभी को ज्ञात है कि समूची मानव जाति के अदृश्य दुश्मन बने कोविड-19 (कोरोना वायरस) ने पूरी दुनियाँ में तबाही मचा रखी है। देश में इसकी दस्तक होते ही सुरक्षा की दृष्टि से सत्तासीन केंद्रीय नेतृत्व ने संपूर्ण भारत में लॉकडाउन का फरमान सुना दिया। माननीय प्रधानमंत्री जी के द्वारा लगाये गये देशव्यापी लॉकडाउन में हुये चक्का जाम की स्थित के बीच आपातकालीन सेवायें छोंड़कर सब पर प्रतिबंध था। जल्दबाज़ी और अचानक से लगाये गये इस लॉकडाउन में देश भर के विभिन्न राज्यों में लाखों की संख्या में अप्रवासी कामगार मजदूर व अवैतनिक वेतन भोगी मजदूर फंस गये।
इस लॉकडाउन के बाद जगह-जगह फँसे मजदूरों के सामने पेट भरने तक की दिक्कत आ गई। जिसके लिये न स्थानीय सरकारें गंभीर हुईं और न ही देश का कोई राजनैतिक दल आगे आया। जोकि भारतीयों के लिये बड़ी शर्म की बात है।
ऐसी स्थित में देखा गया कि कई मजदूर परिवार लॉकडाउन में अपनी दुर्दशा होते देख हजारों हजार किलोमीटर की दूरी पैदल ही तय करते हुये, घरों के लिये चल पड़े।
           छोटे-छोटे बच्चों सहित भूखे-प्यासे सड़कों पर भटकते लाखों लोगों वाला दृश्य हृदय को झकझोर देने वाला था, जोकि अभी भी है। इन लाखों मजदूरों की परेशानी देख हमने अपने सहयोगी और समर्थकों के साथ विचार विमर्श किया और मजदूरों की इस गंभीर समस्या के समाधान हेतु एक गिलहरी प्रयास करना चाहा। जिसके तहत तय हुआ कि हमारे द्वारा निजी ख़र्चे पर मजदूरों को सुरक्षित उनके घरों तक पहुंचाने के लिये 100 बसों के लिये, केंद्र व भिन्न-भिन्न राज्य सरकारों से अनुमति माँगी गई। हमारा कहना था कि इन बसों से सरकार अपनी निगरानी में विभिन्न स्थानों पर फँसे मजदूरों को उनके घरों तक पहुंचाए, और आवश्यकतानुसार स्थानीय प्रशासन कुशल चिकित्सकों की देखरेख में उन्हें क्वारंटीन कराये व उनपर निगरानी रखे।
              लेकिन गरीब मजदूरों के हितों के लिये सरकार के रीढ़ की हड्डी साबित होने वाला हमारा यह अनुमति पत्र मा. प्रधानमंत्री कार्यालय और कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों के कार्यालय में इधर से उधर घूमता रहा। किसी सक्षम जिम्मेदार ने इस पर गौर ही नहीं फरमाया। सरकार द्वारा मजदूरों की इस गंभीर समस्या को अनदेखा करने वाले मुद्दे पर इन्हीं लाखों-करोड़ों लोगों की राजनीति करने वाले देश के किसी भी राजनैतिक दल ने इस ओर न ध्यान आकर्षित किया और न ही आगे आया। सवाल ये उठता है कि हमारे द्वारा माँगी गई बसें चलवाने वाली अनुमति न देकर सरकार द्वारा और बेफिक्री का चश्मा चढ़ाये विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा, लाशों के ढेर लगा देने वाली इस महामारी के बीच इन अप्रवासी मजदूरों की उपेक्षा क्यों की गई? जोकि लोकतंत्र में के हिसाब से बहुत ही गैर जिम्मेदाराना है।
             वहीं मजदूरों की समस्या नासूर बनते देख सरकार ने 15 दिन बाद, हमारे अनुमति पत्र पर सिर्फ आश्वासन दिया, जबकि इस मामले में आश्वासन नहीं त्वरित अनुमति देने की आवश्यकता थी। जोकि राज्य सरकारों को समय रहते देना चाहिये था। मानवेंद्र आजाद द्वारा दिये गये मजदूरों के हितकारी प्रस्ताव से सरकार हरकत में आई और आनन-फानन में सिर्फ आश्वासन दे डाला।
        खैर कोई बात नहीं हमारा देश चलाने वाले जिम्मेदारों से सिर्फ यही कहना है कि अगर जनमानस ने आपको जिम्मेदारी वाले नेतृत्व को दिया है तो जनमानस की समस्याओं का समाधान करने की भी आपकी ही जिम्मेदारी है। जिसका जिम्मेदार लोगों ने बखूबी निर्वहन नहीं किया।
                हमें तो सिर्फ इतना पता है कि ...
*किसी का मसीहा, किसी की जान होता है!*
*मजदूर, मजदूर होने से पहले इंसान होता है!!*
मुसीबत में फँसे देश के प्यारे मजदूर भाइयों से सिर्फ यही कहना है कि उम्मीद की आस मत छोड़ना, जैसे भी हो, जहां हो निराश मत होना, धैर्य बनाये रखना, ईश्वर सभी की रक्षा अवश्य करेगा। जल्दी ही कोई चमत्कारिक निर्णय होगा जिससे कि आप लोग अपने -अपने यथा स्थान पहुँच सकेंगे।
मानवेंद्र आजाद को दुःख है कि चाहते हुये भी हम, आप लाखों मुसीबत के मारों का सहारा समय पर नहीं बन पाये। हमें इसकी पीड़ा थी, है और हमेशा रहेगी। हमारी संवेदनायें आपके साथ हैं। ईश्वर जल्दी ही आपकी सुनें।
!!जय हिंद!!

आपका साथी :-
*मानवेंद्र आजाद*
(संस्थापक)
*मिशन-100*
☎️ +919455544444

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