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Saturday, May 9, 2020

लखनऊ : औरंगाबाद में 16 मजदूरों की दर्दनाक मौत वाली ह्रदय विदारक घटना के बाद बोले मानवेंद्र आजाद, कही बड़ी बात ...



- मजदूरों की मजबूरी वाले लंबे सफ़र और दयनीय स्थिति पर मिशन-100 के संस्थापक ने जिम्मेदारों पर साधा बड़ा निशाना

Lucknow- ✒️ सर्वोत्तम तिवारी...
मंजिलें भी जिद्दी हैं, रास्ते भी जिद्दी हैं ....
देखतें हैं कल क्या हो, हौंसले भी जिद्दी हैं!!
कुछ इस तरह की लाइनों को बयाँ करती देश भर में लाखों मजदूरों की जिंदगी आज दाँव पर लगी हुई है। दुनियाँ को हिलाकर रख देने वाली महामारी आज मजदूरों पर भारी पड़ गई।
कोरोना और लॉकडाउन की दोहरी मार झेल रहे देश भर में प्रवासी/अप्रवासी मजदूरों का दर्द आज किसी से छिपा नहीं है। रोटी के लिये गाँव और घर छोड़ने वाले जगह-जगह, शहर-शहर लॉकडाउन में फँसे मजदूर अब हादसों का शिकार होने लगे। सरकारों और देश की सभी राजनीतिक पार्टियों की अनदेखी के शिकार मजदूरों के लिये कोरोना की मजबूरी उनकी दर्दनाक मौत बन गई। देश भर में चौतरफ़ा हाइवे और रेलवे ट्रैकों पर पैदल चल रही लाखों मजदूरों की भीड़ से अभी भी न जाने कितने हादसे होने का अंदेशा आज नकारा नहीं जा सकता। लॉकडाउन के शुरुआती दौर से ही देश भर में फँसे मजदूरों को अनदेखा किया गया, जिस पर न राज्य सरकारें गंभीर हुईं और ना ही राजनीतिक पार्टियां। नतीजा, अपनी दयनीय परिस्थितियों को देख लाखों मजदूर, मजबूरी में हजारों किलोमीटर की दूरी पैदल ही तय करते हुये दर-दर भटक रहे हैं। किसी से छिपा नहीं है कि लॉकडाउन में फँसे मजदूर खाने और रहने की समस्या के कारण अपने घरों के लिये पैदल ही पलायन कर गये। मजबूरी में किये गये पलायन के बीच, रोटी के लिये गांव व घर छोड़ने वाले 16 मजदूरों की औरंगाबाद में मौत से मुलाक़ात हो गई। दर्दनाक हादसे में मौत की नींद सोये इन मजदूरों के सामने अब न भूख का भाव रहा, और न रोटी का सवाल।
देश की सरकारें जहां अब मुआवजे का मरहम लगाएंगी, वहीं विभिन्न राजनीतिक पार्टियां संवेदना व्यक्त करके कोरी राजनीति चमकाती नजर आयेंगी। ये बातें मिशन-100 के संस्थापक, श्रमिक नेता मानवेंद्र आजाद ने कही। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन के बाद फँसे देश भर में मजदूरों की अनदेखी और औरंगाबाद के 16 मजदूरों की दर्दनाक मौत का असली जिम्मेदार आखिर कौन?

                 आजाद ने कहा कि हमारे द्वारा लॉकडाउन के पहले चरण में ही जगह-जगह फँसे मजदूरों को उनके घरों तक सुरक्षित पहुंचाने के लिये अपने निजी खर्चे पर 100 बसें चलाने का प्रस्ताव केंद्र सरकार व विभिन्न राज्य सरकारों को दिया गया था। जिसमें सरकारों को सिर्फ अनुमति प्रदान करनी थी। इस प्रस्ताव पर अनुमति से जहां मजदूरों को समस्याओं से निजात मिलती, वहीं सरकार की काफी मदद होती, लेकिन किसी जिम्मेदार ने इस प्रस्ताव पर अमल नहीं किया। और न ही इस मुद्दे पर देश में राजनीति करने वाली सभी राजनैतिक पार्टियाँ आगे आयीं। उन्होंने कहा कि अब अधिकतर पार्टियां व नेता अपनी-अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं। कोई कह रहा है कि हम मजदूरों का किराया देंगे, तो कोई कह रहा हम। अगर वक्त रहते इन नेताओं व पार्टियों का सेवा भाव जाग जाता तो शायद आज लाखों मजदूरों की ऐसी दयनीय स्थिति न होती और न ही दर्जनों मौतें।
मानवेंद्र आजाद के अनुसार, सरकारों की अनदेखी का शिकार मजदूरों के सामने रहने और खाने की गंभीर समस्या थी, तभी तो कोरोना जैसे खतरनाक संक्रमण के बीच ही लाखों मजदूर हजारों किलोमीटर की दूरी पैदल ही तय करते हुये घरों के लिये पलायन कर गये। 45 दिनों से शहरों में फँसे मजदूरों को रोटी नहीं मिली, जिसके कारण मजदूरों का पलायन जारी है। उन्होंने कहा कि मजदूरों से स्थानीय सरकारों का मिस कम्युनिकेशन रहा, उनको ट्रेन और बसें चलने की सही जानकारी नहीं मिली, फार्मेलिटी के नाम पर तरह-तरह से परेशान किया गया, दावों और वादों के बीच बराबर मिलने वाले झूठे अश्वासनों से मजदूरों का भरोसा टूटा, जिससे कि दिन पर दिन अपनी स्थितियां बदतर होती देख, लाखों मजदूर, लाशों के ढेर लगा देने वाले खतरनाक वायरस कोरोना से भी सामना करते हुये पलायन कर गये।
         
                मानवेंद्र आजाद ने मजदूरों की इस गंभीर समस्या पर सरकारों व विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के साथ-साथ इन गरीबों का वक्त बेवक्त शोषण करने वाले फ्रंटल संगठनों पर भी बड़ा निशाना साधा है। उनका कहना है कि कहाँ गये वो कन्हैया कुमार, कहाँ गये हार्दिक पटेल और कहाँ गये भीम आर्मी के कर्ता-धर्ता सहित अन्य फ्रंटल संगठन और अवसरवादी नेता। जो महामारी के दौर में भुखमरी की मार झेल रहे लॉकडाउन में फँसे मजदूरों की दीन दशा पर आगे नहीं आये, आखिर क्यों नहीं पसीजा उनका दिल?
       
             औरंगाबाद में रेलवे ट्रैक पर हुये दर्दनाक हादसे में हुई 16 मजदूरों की मौत पर उन्होंने कहा कि, हमेशा कड़ी मेहनत करने वाला मजदूर संघर्ष करते हुये जिंदगी से लड़ता है। लॉकडाउन में फंसे मजदूरों ने कई समस्याओं को देखते हुये मजबूरी में, मीलों पैदल चलकर घरों का रास्ता तय किया। पुलिस की मार, पूंछताछ व रोके जाने के डर से रेलवे ट्रैक का रास्ता चुना होगा। मर जाना उनका विकल्प नहीं था, वो हारना नहीं चाहते थे, जूझना चाहते थे। लेकिन मजबूरी और जिंदगी के संघर्ष ने इनके जिंदगी की रेल छीन ली। उनके घरों में किसी की बीबी इंतजार कर रही थी, तो किसी की बहन, किसी के भाई इंतजार कर रहे थे, तो किसी के मां बाप, लेकिन वो बेचारे मजदूर घर नहीं पहुंच सके। रोटी के लिये अपना घर, परिवार और गाँव छोड़ने वाले इन मजदूरों की भूख ने जिंदगी लील ली। अब उनके सामने न भूख का भाव है और न ही रोटी का सवाल। आज उनके परिवारों में कोहराम मचा हुआ है।
मिशन-100 के संस्थापक मानवेंद्र आजाद ने औरंगाबाद में मजदूरों की मौत पर गहरा शोक प्रकट किया, उन्होंने कहा ऐसी दुःखद घटना वाले समाचार से ह्रदय व्यथित है, हमारी मजदूर परिवारों के साथ संवेदनाएं हैं। ईश्वर परिजनों को इस दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करे।
साथ ही पलायन कर रहे मजदूर भाइयों से अपील की है कि, सरकारी आदेशों की जानकारियां हैं कि मजदूरों के लिये ट्रेनें व कई बसें भी चलाई जा रही हैं।
धैर्य रखें, ईश्वर आपकी मदद करेगा...
सरकार पर भरोसा रखें, किसी भी हाल में जान जोखिम में न डालें।

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