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Monday, March 18, 2019

पांच सौ वर्ष पुराने बने शिव मंदिर की रहस्यमई कहनी।


कानपुर शहर के गल्लामंडी के  बनपुरवा गांव में मुगलों के समय का एक पुराना शिव मंदिर स्थापित है।

मंदिर का इतिहास : 
बनपुरवा गांव में स्थापित पुराना शिव मंदिर आज से करीब पांच सौ वर्ष पुराना है। यह पुराना शिव मंदिर जो कि नौबस्ता गल्ला मंडी कसिगवा जाने वाली रोड बनपुरवा गांव में है। यहां पर लोग अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए बाबा शिव के दर्शन करने आते है। लोगों का कहना है कि बहुत समय पहले इस शिव मंदिर में बाबा द्वारकेश्वर पुजारी हुआ करते थे। पुजारी द्वारकेश्वर इस शिव मंदिर में पूजा अर्चना किया करते थे कुछ समय इसी तरह बीतते गए उसके बाद पुजारी द्वारकेश्वर ने मंदिर के पास अपनी जिंदा समाधि ले लिया। जिस कारण से शिव मंदिर का नाम बाबा द्वारिकेश्वर धाम का नाम पड़ गया। यह मंदिर एक घने जंगल में स्थित है। कई साल पहले यहां पर एक काशी नाम का गांव हुआ करता था।
शिवलिंग की रहस्यमई कहानी :
ग्रामीणों ने बताया कि शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग मुगलों के समय की है। आज से पांच सौ वर्ष पहले जब देश मे मुगलों का शासन हुआ करता था तभी इस यहां पर काशी नाम का एक छोटा सा गांव था गांव के किनारे एक घना जंगल था एक बार राजू नाम का चरवाहा अपने जानवरों को चराते हुए इसी जंगल मे आ गया। वह अपनी गाय व भैंस चरा रहा था तभी उसे जंगल से कुछ आवाजें सुनाई दिया वह आवाज़ सुनकर डर गया लेकिन हिम्मत करके वह जंगल की झाड़ियों में प्रवेश किया तो उसने देखा कि एक शिवलिंग में सांप लिपटा हुआ है यह देखकर चरवाहा राजू डर से कांपने लगा और भगवान शिव का नाम लिया कुछ ही पल शिवलिंग में लिपटा सांप अदृश्य हो गया। यह घटना देखकर राजू ने गांव के कई लोगों को इस बारे में जानकारी दिया गांव के सभी लोगों ने मिलकर जंगल में आकर देखा तो राजू की बात सत्य निकली शिवलिंग वैसे ही जमीन में पड़ी मिली गांव के सभी लोगों ने मिलकर शिवलिंग को एक सही देखकर पूजा अर्चना के साथ शिव मूर्ति को स्थापित कर दिया। फिर धीरे धीरे मिलकर सभी लोगों ने शिव मंदिर का निर्माण कराया।क्षेत्रीय लोगों ने बताया कि 50 सालों से एक बाबा शिवलिंग की पूजा कर रहे है। और बाबा द्वारकेश्वर धाम का देखरेख कर रहे है। उससे पहले उनके पिताजी वहां पर बाबा द्वारिकेश्वर धाम की सेवा कर रहे थे। जहां पर एक कुआं है जो कि आज भी उस कुआं से ठंडा निर्मल पानी निकलता है। पुजारी द्वारकेश्वर खड़ाऊं पहन कर नदी पार कर जाया करते थे और वह सुबह दातून करते थे और जो दातुन करने के बाद उस दातून को जहां पर भी फेंक देते थे उस जगह पर इमली का पेड़ उत्पन्न हो जाता था। सावन भर इस मंदिर पर  लोगों की भक्ति और आस्थाएं देखने को मिलती है। दूर-दूर से लोग भगवान शिव के दर्शन के लिए आते है।

रिपोर्ट- शिवम सविता

नेशनल आवाज़ कानपुर

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